Tuesday, June 16, 2015

समाज और गालियाँ


रास्ते चलते, कहीं सफर करते, एक चीज़ बहुत ही सामान्य है जो सुनने को मिलेगी वो है गाली । कोई आपस
में, तो कोई झगडे में, तो कोई सुदूर स्थित किसी रिश्तेदार को, कोई अपने बॉस को, बस बिना मांगे गालियां जरूर देता है । किसी ने कहा है कि अगर कोई गाली दे तो, जब तक आपने लिया नहीं वो आप पे नहीं है, अब पता नहीं कितने लोग इसको फॉलो करते होंगे । पर एक चीज़ तो स्पष्ट है ये सदैव महिलाओं को लक्ष्य करके बनायीं गयी हैं। अब पता नहीं इसका इतिहास क्या है और कैसे शुरू हो गयी, पता नहीं हमारे पूर्वज चाहे वो राजा महाराजा हो या कोई और गालियां देते थे की नहीं ? इतना तो तय है की ये भी हमारी उस संस्कृति का हिस्सा है जिसपे हमें हमेशा गर्व रहता है, ये हमारी उस  सोच की उपज है जहा हमें लगता है कि पुरुष ही सर्वोपरि है और महिलाओँ  का स्थान उनसे नीचे ही है ।
हमारे यहाँ की कुछ आम बोल चाल की गालियां भी देखिये जैसे "साला " या फिर भोजपुरी में जैसे "ससुरा " भी महिलाओं के रिश्तेदारियों पे बनी हैं । ऐसा नहीं किए ये भारत में ही है बल्कि ये आपको विश्व के और भी देशों में मिल जाएँगी, सबमें बस महिलाओं को ही लक्ष्य बनाया गया है । पुरुषों के लिए एक भी गाली नहीं है यहाँ तक की महिलायें भी जो गालियां प्रयोग करती वो खुद भी महिलाओं के लिए ही होती है, वे आज तक पुरुषो के लिए गालियां तक ना बना सकी ।
कल्पना करिये क्या गुस्सा बिना गालियों के नही हो सकता, क्या पुलिस बिना गाली के मुजरिम से पूछ ताछ नही कर सकती, ये हो सकता है और बहुत सारे लोग ऐसे होंगे भी जो ऐसा करते भी होंगे , ये बस उस संस्कृति का हिस्सा है जो हमारे चारो ओर है, और जिसमे हम शुरू से रहते आ रहें हैं । विश्व योग दिवस की तरह हमें एक और दिवस की जरूरत है जहाँ हम अपने मानसिक विकार मिटाने का भी संकल्प ले, नहीं तो ये विकार हमारी कई पीढ़ियां बर्बाद कर देगा । 



Monday, April 27, 2015

भारत में सॉफ्टवेयर इंजीनियर का स्ट्रगल


 नवाबों  के शहर लखनऊ में उस वक़्त इंजिनीयरिंग कॉलेजों की भरमार सी हो गयी थी, हर थोड़ी दूर पे कोई न कोई कॉलेज मिल ही जाता । कॉलेजों में भी ऐसी होड़ मानो वो सबको इंजीनियर या डॉक्टर ही बना के छोड़ेंगे । किसी के एस एम एस (SMS ) तो कोई रोड पे पम्फ्लेट बाटते मिल ही जाता । मैंने भी ऐसे ही एडमिशन ले लिया और कोर्स का नाम था एम सी ए ( MCA ). पता नहीं क्यों मुझे हर बार ये कोर्स ऐसे लगता मानो किसी ने इसे बना तो दिया मगर इसके बाद वो भूल गया कि इसका करना क्या है । पता नहीं उसको क्या सूझी और ऐसा सौतेला व्यवहार इसके साथ किया की बस पूछिये मत ।
 3 साल ग्रेजुएशन और 3 साल पोस्ट ग्रेजुएशन के बाद भी MCA  वालो को Btech के बराबर नहीं समझते , MCA वालो का हाल मेले में बिकने वाली बूढी गाय जैसा होता है जो की पसंद तो सबको है पर ज्यादा उम्र होने के कारण खरीदता  कोई नही ।
मेरे कई सारे मित्रों ने MBA में एडमिशन लिया , उनका हाल तो बस पूछिये मत, वे हर रोज हमें यही बताते की तुम जितना चाहे मेहनत करो, कुछ भी करो रहोगे हमारे नीचे ही, अब भला ये भी कम भेदभाव था क्या ? उनकी दो साल की पढाई और हमारी तीन साल की और फिर भी हम उनके नीचे काम करेंगे । पर करें भी तो क्या MCA ऐसा है ही ।
साल गुजरते गए, इतने दिनों में मैंने एक चीज़ जरूर महसूस किया कि सबका कोई न कोई माई बाप है जो उनको बाहर मतलब ( भारत से बाहर ) जॉब दिला देगा, किसी के भैया तो किसी के मामा तो कोई अपने होने वाले जीजा से पहले ही बात कर लिया, लगता था कि इधर रिजल्ट आया नहीं की उधर बाहर जाना तय है। कई लोगो ने तो फाइनल ईयर का प्रोजेक्ट बनाने से पहले अपना पासपोर्ट बनाना उचित समझा । इधर एग्जाम के बाद कंपनियों  का आने का सिलसिला शुरू हुआ, पर उनका क्राइटेरिया ऐसा कि  95 % लोग तो फिट ही नहीं बैठते , ऐसा लगता मानो  ये सब पिछले कुछ वर्षो के पापों का प्रायश्चित था, अब पछतावा होता कि उस समय थोड़ा और प्रैक्टिकल विषयों पे ध्यान दे देते तो आज ये दिन ना देखने को मिलते । हमारे कॉलेज में फिऱ भी एक दो कंपनी का आगमन हुआ मगर कइयों में तो दूर दूर तक दर्शन नहीं हुए ।
अब एक ही स्थान था जो हमें इस कलंक से मुक्ति दिला सकता था और वो था दिल्ली। हमने भी दिल्ली चलो का नारा दिया और कई सारे मित्रों के साथ दिल्ली प्रस्थान कर दिया । जैसे सिविल सर्विसेज की प्रिपरेशन के लिए मुखर्जी नगर मशहूर है वैसे ही सॉफ्टवेयर इंजीनियर के लिए न्यू अशोक नगर । न्यू अशोक नगर में हर जगह लोग जावा , डॉट नेट करते मिल जायेंगे, तभी एक कहावत यहाँ बहुत ही मशहूर है कि अगर आप यहाँ कोई पत्थर उछालो तो वो जरूर किसी ना किसी सॉफ्टवेयर इंजीनियर के उपर ही गिरेगा  । 
सरकारी नौकरियों के विपरीत सॉफ्टवेयर इंजीनियरों की भर्ती एक दम अलग होती है, ना कोई फॉर्म ना कोई चालान का झंझट बस वेबसाइट से पता करो और रिज्यूम और पानी की बोतल ले के निकल जाओ ।  फ्रेशर को तो कंपनी का गार्ड ही गेट से भगा देता, पता नहीं इस फील्ड में कोई एक्सपेरिन्स  कैसे पाता  है ये बात मेरे लिए आज भी एक पहेली बनी  हुई है । एक चीज़ और, हमेशा walkin  से बचना चाहिये  पता नहीं कब पुलिस भीड़  कंट्रोल करने के लिए डंडा चला दे । नॉएडा तो walikin  का एक गढ़ है, सॉफ्टवेयर कंपनी के रिक्रूटमेंट की एक खासियत होती है आपको सीट नहीं पता चलती बस आप अपना कर्म करते रहिये अगर अच्छा हुआ तो ठीक नहीं तो HR की प्यारी सी मुस्कान के साथ "लीव फॉर द  डे " सुनिए ।  यहाँ सरकारी नौकरी जैसा कुछ भी नहीं कि आपका रोल नंबर लिस्ट में होगा या नहीं होगा, यहाँ अगर आप नहीं भी सेलेक्ट होते तो आपको आपके ना सेलेक्ट होने की खबर ऐसे दी जाएगी की बस आप समझते समझते अपने घर पहुंच जायेंगे कि आखिर हुआ
क्या ।
खैर, जब ऐसे भी कुछ ना हुआ तो मैंने भी कंसल्टेंसी जाने का निर्णय किया,नया होने के कारण  कुछ पता नहीं था बस सुना था की लक्ष्मी नगर में बहुत सी कंसल्टेंसी है, मैंने भी १०० रुपये देकर रजिस्ट्रेशन करा लिया । रात और दिन इस इंतज़ार में कटते  मानो कब कॉल आ जाये । बस फिर अगले दिन कॉल आई और मैं गया भी पर मैं जाते ही समझ गया की ये सब पैसे बनाने के तरीके हैं । दिल्ली में आपको ऐसे भी कंपनी मिलेगी जहाँ आपको अपने लैपटॉप के साथ जाना पड़ेगा और जहाँ आपने सैलरी की बात की तो बस पूछिये मत, इतना वर्कलोड मिलेगा की या तो आप कंपनी छोड़ देंगे या फिर दुबारा सैलरी मांगने की हिम्मत ना करेंगे । कुछ तो कंपनी ऐसे भी मिलेंगी जो आपके पैसे लेकर आपको ही देंगे और फिर कुछ महीनो बाद वहां कंपनी के कोई अवशेष ना मिलें ।

विश्व के सबसे हसीन जॉब की तमन्ना दिल्ली आ के दम तोड़ देगी, जब आपको लोग बिना सैलरी के जॉब करते मिलेंगे वो भी केवल एक्सपेरिंस पाने के लिए, सोच लीजये क्या अब भी आप भारत में सॉफ्टवेयर इंजीनियर बनना चाहते हैं ?