Saturday, April 16, 2016

हमारी तार्किकता में धार्मिकता का घुन


अभी पिछले कुछ वर्षो से एक ऐसे दौर की शुरुवात हुई है जहां पे हर धर्मो ने ये कहना शुरू कर दिया है की फलां -अमुक खोज हमारे धर्मो में पहले से ही थी, वो चाहे हिन्दू  हो, मुसलमान हो या फिर ईसाई हों । इस तर्क को प्रस्तुत करने वाले अक्सर वो लोग ही होते हैं जिन्होंने कभी शायद ही अच्छा वैज्ञानिक अध्यन किया हो । उनके लिए सबसे आसान है यही कि किसी वैज्ञानिक खोज को आसानी से किसी कुरान की आयत या फिर श्लोक या फिर बाइबिल की किसी लाइन से जोड़ दें  और वर्षो के अनुसन्धान को पल भर में जीरो कर दें ।

एक अनुसन्धान करते हुए व्यक्ति के तार्किकता और धार्मिक विचारों में जबरदस्त लड़ाई होती है, कई बार आस्था डगमगा जाती है तो कई बार मजबूत होती है जैसे डाक्टरों के साथ होता है उन्हें कारण पता होता है पर अंत में उन्हें कहना पड़ता है की दवा के साथ दुआओं की भी जरूरत है । एक अंतरिक्ष में प्रवेश करते हुए एस्ट्रोनॉट के मन में भी यही उधेड़ -बुन  होती  होगी  पर जब वो पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण से बाहर  निकल जाता होगा तो सचमुच उसकी आस्था डगमगा जाती होगी, और जब एक शांत आकाश मंडल में घूमते हुए यान से पृथ्वी को देखता और फिर अन्य ग्रहों को देखता होगा तो शायद उसकी आस्था पे जबरदस्त चोट होती होगी । पर क्या एक अच्छा वैज्ञानिक बनने  और बड़े प्रयोग  में लगे लोग धार्मिक नहीं होते, मुझे लगता है जरूर होंगे पर वो ऐसे विषयों को मिक्स नहीं करते ।
अगर एक डॉक्टर या फिर एक एस्ट्रोनॉट भी आस्था और विज्ञान को मिक्स कर दे तो क्या होगा ? डॉक्टर के लिए डॉक्टर बनना मुश्किल हो जायेगा और एस्ट्रोनॉट के लिए अंतरिक्ष की यात्रा । इसके  उदहारण  देखने ज्यादा दूर जाने की जरूरत नहीं है अपने यहाँ जब पिछली बार हुई इंडियन  साइंस कांग्रेस  में एक जीव विज्ञानी ने  "लार्ड शिवा ऐज ऐनवायरमेंटलिस्ट " पेपर प्रस्तुस्त किया तो काफी चर्चा हुई , प्रसिद्ध नोबेल प्राप्त विज्ञानी वेंकट रमन रामकृष्णन ने तो इसे सर्कस ही करार दे दिया था और इसकी काफी आलोचना की थी कि विज्ञान और धर्म को मिक्स किया जा रहा है । हमारे यहाँ मंगलयान लांच होने से पहले तत्कालीन इसरो चीफ राधाकृष्णन भी मंदिर गए थे, जिस पर उनकी कई लोगो ने आलोचना की थी, अपने पडोसी देश पाकिस्तान का तो और भी बुरा हाल है वहां पे तो जिन्न  से कैसे बिजली बनायीं जा सकती है इस पर ही रिसर्च पेपर पब्लिश हो जातें  है  सैटलाइट या मिसाइल परिक्षण  के दौरान  वैज्ञानिक  'अल्लाह हू अकबर ' के नारे लगाते हैं ।  ऐसा नहीं की वे वैज्ञानिक नहीं हैं परन्तु फिर  भी उनके वैज्ञानिक नज़रिए में धर्म की छाया जरूर होती है, ये एक वैज्ञानिक सोच में रूकावट पैदा करती है ।   अक्सर हम एशियाई  देशो की ये ही सबसे बड़ी समस्या है, हम हर खोज, तकनीक को कही ना कही धर्म से जोड़ ही देते हैं । हमारे यहाँ रिसर्च ना होने के भी यही कारण हैं, पश्चिमी देश इन चीज़ो से निकल चुके हैं । सन 1850  से 1950 बड़ी बड़ी रिसर्च का दौर रहा है, इनमे ज्यादातर ऐसे लोग थे जिन्हे बहुत ज्यादा धुन थी कुछ  करने की और वे बहुत ही ज्यादा धार्मिक नहीं थे । हाँ कुछ अद्भुत लोग भी हुए हैं जैसे आइंस्टीन, उन्होंने तो गॉड की परिकल्पना को ही इक्वेशन से साबित करने का प्रयास किया था ।
धर्म और विज्ञान दोनों ही दो अलग विषय, दोनों का अलग अलग अध्ययन जरूरी है पर दोनों का घाल-मेल नहीं होना चाहिए ।  मुझे नहीं पता कौन सी ऐसी रिसर्च हुई जिसको किसी आयत, श्लोक या फिर कुछ लाइनों के पढ़ने के बाद किया गया हो ।
जब बात हिन्दुओं की होती है, हम हमेशा कहते है हमारा भूतकाल अच्छा रहा है, हमारे यहाँ  आर्यभट, चरक आदि जैसे महान  लोग हुयें  हैं पर बाद में क्या हुआ ? कुछ नामों  को छोड़ दे हमारा सफर जीरो ही रहा है ।
और यही आज हमारे अर्थव्यवस्था  की परेशानी का कारण  है, इतने हथियारों, आधुनिक उपकरणों का हमें आयात करना पड़ता क्यूंकि हमने वैज्ञानिक सोच को मौका ही नहीं दिया, जो हुए भी वो भी हमें छोड़  के दूसरे देशो में चले गए । ये सरकारों को सोचना पड़ेगा वो कैसा समाज चाहते हैं, ऐसा समाज जो धर्म के नाम पे लड़ता हो या फिर एक धर्मनिरपेक्ष जिसमे स्वतः एक आधुनिक वैज्ञानिक सोच हो ।
जहाँ तक मेरा मानना  है धर्म और तर्क रेल की पटरियों जैसे हैं जो चलते साथ पर  मिलते कभी नहीं, पर जब मिलते है तो दुर्घटना जरूर होती है ।  इसलिए हमें एक ऐसे समाज की आवश्यकता है जो इन दोनों में विभेद कर सके, नहीं तो हम आज जैसे हैं वैसे ही रहेंगे, दिन रात महाशक्ति का  दम्भ भरेंगे पर डेंगू और चिकनगुनिया से ही हजारो मौतें हो जाया करेंगी।