Sunday, June 26, 2016

ये कैसी बारिश !

सूखे हुए दरख्तों से आवाज़ आई, उफ्फ क्या बला आई
जो गिरी कुछ बुँदे जमीं पे, क्या खूब घटा छाई
अब सारे परिंदे घर की राह देखेंगे
छोटे बड़ों का साथ देखेंगे
फ़ैल जायेगी हरियाली हर तरफ
उफनते नदियों का सैलाब देखेंगे ।

मैं भी चंद हिस्से जमा कर लेता हूँ
इन्ही दरख्तों को घर बना लेता हूँ
इन बारिशों की तेज धार में
हरे पत्तों की आड़ ले लेता हूँ ।

इन शाखों पे मैं अकेला नहीं
हैं और भी जो खूब जमे बैठे हैं
चहकते शोरों के बीच
जो खूब सजे बैठे हैं ।

कुछ उड़ते, कुछ बैठते
कुछ पंखो को फड़फड़ाते
हर बिजली की गरज पे
कुछ बच्चे यूँ ही डर जाते

पत्तों से गिरती छन के बुँदे
पंखों को जब भिगो देती
माँ पंखो को फैला के
एक पल में झटक देती।

ये देख बच्चे भी इन्हे यूँ ही दोहराते
पंखो को फड़फड़ाते
माँ - मां  चिल्लाते
और फिर सीख जाते ।

क्या पता कब ये थमेगी बारिश
कब फिर से आसमान साफ़ होगा
कब चढ़ेगा फिर से सूरज
कब चमकते तारों का प्रकाश होगा ।

उफ़ ये लहरती बारिश ,
उफ़ ये ठहरती बारिश
उफ़ ये चमकती बारिश
उफ़ ये गरजती बारिश ।

इस बिजली की कड़क में
कितने यूँ  ही मर जाएंगे
कितने हो जायेंगे घोंसले खाली
कितने घर उजड़ जायेंगे ।

हम पछियों की यही दास्ताँ है
कभी यहाँ कभी वहाँ आसिया हैं
घटते पेड़ और सूखती नदियां
बदलते मौसम ही कब्र्गाह हैं

लो थम गयी बारिश
उड़ने  का वक़्त आ गया
चलता हूँ नए जगह
घर छोड़ने का वक़्त आ गया ।


 

















Thursday, June 23, 2016

किताबें


कल ही आलमारी खंगालते कुछ किताबो से पाला पड़ा
मानो सालो पहले की तस्वीरों का मुआयना चाहती
धुल में लिपटी गन्दी मटमैली, बिखरी
फिर भी बहुत सी यादें समेटे ।

हर पन्ने  पे कुछ यादें यू उभर जाती
कुछ भीगी, कुछ खुशबू,  कुछ मिटटी
आज भी वो सारे पल वो समेटे बैठी
जब मैं कुछ नहीं था, जब मैं केवल छात्र था ।

वो खींची गयी रेखाएं , जो कुछ याद दिलाती
वो स्कूल का शोर , वो टीचर की बातें
वो परीक्षाओं का दौर , वो जल्द बीतने वाली रातें
वो ३ घंटे की शांति और फिर जबरदस्त शोर ।

कुछ भीग के सूखे पन्ने, कुछ फटे पन्ने
याद दिलाते उस बारिश का,
जो जब उस समय ही बरसी थी
फिर आज तक नहीं हुई
फटे पन्ने तो बस कुछ शरारत की निशानियां थे ।

शहर दर शहर साथ थी, थक के भी इन्ही पे सोया
कभी खोयी कभी कभी मिल गयी
खूब छकाया खूब दौड़ाया
कभी इस दुकान कभी उस दुकान

कभी इस दोस्त के पास कभी उसके पास
आज तो उनका पता नहीं
पर फिर ये मुझे नहीं भूली
उनकी निशानियां आज भी मौजूद हैं ।

कुछ शब्द तो लिखे हैं
पर क्या करूँ आज तो याद भी नहीं किसने लिखे
अच्छा इम्तेहान है ये अतीत पहचानने का
याद दिलाने का की कितना मैं बदल गया
और कितना सब भूल गया।






Sunday, June 12, 2016

क्रिकेट की यादें

अभी कल ही मैदान में घाँस काटी थी, अच्छा खासा पानी दे के आये थे, और आज लगता है बारिश हो के पुरे मैदान को गीला  कर देगी। पूरी रात और अगले दिन तक ये ख्याल दिमाग में बार बार आते । पर ये बात आज की नहीं  १० -१२  साल पहले की है जब क्रिकेट ही हमारे लिए सब कुछ था। क्रिकेट का मैदान ही घर हुआ करता था। आज भी जब ऐसे ही मैदानों के पास  से गुजरता हूँ तो जरूर एक बार ऐसा लगता कि शायद यहाँ भी खेलने वाले ऐसे सोचते होंगे, उन्हें भी अपने मैदानों की ऐसी ही फिक्र होती होगी ।
हो भी क्यों न, इन्ही मैदानों ने हमें साथ रहना सिखाया, हमें लड़ना सिखाया, अलग सम्प्रदाय, अलग जाति  से होते हुए भी हम सब एक थे । एक ही थाली में खाना खा ले ते और एक ही गिलास में पानी पी लेते। स्कूलों  में तो बस हमें केवल बता दिया जाता, कि  हम सब एक हैं, एकता में शक्ति है पर ये सब सीखते तो हम इन्ही मैदानों पे थे ।
उस समय सुबह शाम बस क्रिकेट ही याद रहता था । अपने मैदान पे खेलने के साथ कभी कभी दूसरी जगह भी खेलने जाना होता था । कई बार हमें अपनी टीम ले के दूसरे शहर जाना पड़ता, कभी किसी मित्र के बुलावे पे जाना पड़ता । पर सचमुच वो यात्रा अद्भुत होती, भरी आबादी वाले शहरों से निकल जब घने पेड़ों वाले सड़कों से गुजरते और वो भी अपने मित्रों के साथ,  तो उस यात्रा का आनंद ही अलग था। कभी बीच में बाइक रोक के चाय-घाटी भी हो जाती । कभी कभी बाइक न होने पे ब्रह्मस्थान से जीप या बस में चढ़ जाते, और कंडक्टर से कहते "भइया मैच खेलने जा रहे हैं ", सवारी न होने पे तो उसे कोई दिक्कत नहीं पर भीड़ होने पे वो भी झल्ला जाता । कभी कभी कभार बस मैदान के पास ही उतार देती, और फिर तो सारे लोगों का ध्यान इधर ही हो जाता कुछ मित्र जैसे डिम्पू और अनुज को लोग पहचान जाते और मिलने आते ।
 मैं अपने अनुभव के आधार पे कह सकता हूँ की अगर सच में क्रिकेट की स्परिट देखनी है तो गावों में देखिये । वो एक अतिथि की तरह लोगो का सम्मान करते हैं। जीतने  पे तो शाबाशी मिलती है पर हारने पे भी पीठ थपथपाते हैं । मुझे याद है जब एक फाइनल मैच हार गए , और जब समापन समारोह में एक नेता आये थे और उन्होंने कहा था कि  "हारने वाले के गले में तो पहले से ही हार होता है " गज़ब का शब्द चुनाव था।

कई बार क्रिकेट से ही शहरो की भगौलिक जानकारी और राजनीती जानकारी भी हुई, हमारे यहाँ अक्सर  क्रिकेट टूर्नामेंट के उद्घाटन और समापन पे किसी न किसी गणमान्य नेता को  बुलाया जाता, कई बार वो राजनीति सीख रहा होता है कई बार वो परिपक्व होता है, और ऐसे मौके उसको लोगो के बीच अपनी बात रखने का मौका देते। उसे वो साहस देते की वो लोगों के बीच अपनी बात रख सके ।
जिस जगह से मैं हूँ वहां आज भी  वहां धर्म और जाति एक बड़ी बहस है, फिर भी  क्रिकेट सबको बांधे रखता है। फिर चाहे वो हिन्दू हो या मुस्लिम । क्रिकेट टूर्नामेंट के नाम पे लोग खींचे चले आतें हैं चाहे दिन के मैच हो या रात्रि के। हर मुह्हले  की एक टीम होती और उनके बीच कभी टाइगर बिस्कुट तो कभी कभी पार्ले जी के लिए मैच हो जाते ।
२-५ रुपये जुटा  के टेनिस की बॉल आती, कुछ देते कुछ नहीं पर कोई बात नहीं थी । हाँ मैच में एंट्री फीस को लेके जरूर दिक्कत होती , पर फिर भी सब मैनेज हो जाता ।
पीढ़ियां बदलती गयी  नए लोग आते गए, पहले जूनियर थे फिर सीनियर हो  गए, कल टीम में होने के लिए तरसते थे फिर खुद ही टीम का चुनाव करने लगे । इन सब लोगों  के साथ खेलने का एक ही अलग अनुभव  था । कई मित्र किराएदार थे आज उनका कोई पता नहीं, कहाँ चले गए। आज जब मैदान नहीं और  लोग इधर उधर चले गए  फिर भी लगता है जैसे ये सब कल ही हुआ था, लगता है आज अभी भी हमारे मैदान वैसे ही होंगे । पर जब कभी घर जाता हूँ देखता हूँ गलियों और रास्तो के आलावा कुछ नहीं बचा, तो दुःख होता है । जिस मैदानों में लोग धुप से बचने के लिए आड़ ढूढ़ते थे आज वहां पे बसे लोग धुप के लिए तरसते हैं ।
हमें भी लगभग हर साल नया मैदान ढूढ़ना पड़ता, उसे बनाना पड़ता। दुःख तब होता जब लोगो से सुनने को मिलता की ये जमीन किसी  ने खरीद ली, हम कर भी क्या कर सकते, फिर से नए मैदान का चुनाव करने में लग जाते । जब हमारे आस पास कुछ नहीं बचा तो रेलवे फील्ड और सोनी धापा मैदान जाने लगे । आज जब मैदानों पे घर बन गए, कई परिवार बस गए पर आज भी वो मैदान याद है, आज भी शाम की हलकी धुप और एक किनारे मेढ़ पे बैठे हम सब अपनी बारी का इंतज़ार करते याद है। वो शाम याद जिसमे रौशनी खत्म हो जाती पर फिर जीत हार के लिए मैच होते याद है ।  वो जोश जिसमे क्रिकेट के कई स्टंप टूट गए , मार खाये पर फिर भी क्रिकेट नहीं छोड़ा याद है ।  इस क्रिकेट ने कई सारे दोस्त दिए, कई सारे लोगों से परिचित कराया , कई जगहें दिखाई, उन्ही दोस्तों के साथ फिर शहर छोड़ा और एक नया रास्ता तलाशने चल दिए ।
आज कुछ ने नौकरी ज्वाइन कर ली कुछ तयारी में लगे हैं, सबने कुछ न कुछ पा लिया है पर उन्हें भी जरूर वो दिन वो शाम वो मैदान याद होंगे।





  

Saturday, April 16, 2016

हमारी तार्किकता में धार्मिकता का घुन


अभी पिछले कुछ वर्षो से एक ऐसे दौर की शुरुवात हुई है जहां पे हर धर्मो ने ये कहना शुरू कर दिया है की फलां -अमुक खोज हमारे धर्मो में पहले से ही थी, वो चाहे हिन्दू  हो, मुसलमान हो या फिर ईसाई हों । इस तर्क को प्रस्तुत करने वाले अक्सर वो लोग ही होते हैं जिन्होंने कभी शायद ही अच्छा वैज्ञानिक अध्यन किया हो । उनके लिए सबसे आसान है यही कि किसी वैज्ञानिक खोज को आसानी से किसी कुरान की आयत या फिर श्लोक या फिर बाइबिल की किसी लाइन से जोड़ दें  और वर्षो के अनुसन्धान को पल भर में जीरो कर दें ।

एक अनुसन्धान करते हुए व्यक्ति के तार्किकता और धार्मिक विचारों में जबरदस्त लड़ाई होती है, कई बार आस्था डगमगा जाती है तो कई बार मजबूत होती है जैसे डाक्टरों के साथ होता है उन्हें कारण पता होता है पर अंत में उन्हें कहना पड़ता है की दवा के साथ दुआओं की भी जरूरत है । एक अंतरिक्ष में प्रवेश करते हुए एस्ट्रोनॉट के मन में भी यही उधेड़ -बुन  होती  होगी  पर जब वो पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण से बाहर  निकल जाता होगा तो सचमुच उसकी आस्था डगमगा जाती होगी, और जब एक शांत आकाश मंडल में घूमते हुए यान से पृथ्वी को देखता और फिर अन्य ग्रहों को देखता होगा तो शायद उसकी आस्था पे जबरदस्त चोट होती होगी । पर क्या एक अच्छा वैज्ञानिक बनने  और बड़े प्रयोग  में लगे लोग धार्मिक नहीं होते, मुझे लगता है जरूर होंगे पर वो ऐसे विषयों को मिक्स नहीं करते ।
अगर एक डॉक्टर या फिर एक एस्ट्रोनॉट भी आस्था और विज्ञान को मिक्स कर दे तो क्या होगा ? डॉक्टर के लिए डॉक्टर बनना मुश्किल हो जायेगा और एस्ट्रोनॉट के लिए अंतरिक्ष की यात्रा । इसके  उदहारण  देखने ज्यादा दूर जाने की जरूरत नहीं है अपने यहाँ जब पिछली बार हुई इंडियन  साइंस कांग्रेस  में एक जीव विज्ञानी ने  "लार्ड शिवा ऐज ऐनवायरमेंटलिस्ट " पेपर प्रस्तुस्त किया तो काफी चर्चा हुई , प्रसिद्ध नोबेल प्राप्त विज्ञानी वेंकट रमन रामकृष्णन ने तो इसे सर्कस ही करार दे दिया था और इसकी काफी आलोचना की थी कि विज्ञान और धर्म को मिक्स किया जा रहा है । हमारे यहाँ मंगलयान लांच होने से पहले तत्कालीन इसरो चीफ राधाकृष्णन भी मंदिर गए थे, जिस पर उनकी कई लोगो ने आलोचना की थी, अपने पडोसी देश पाकिस्तान का तो और भी बुरा हाल है वहां पे तो जिन्न  से कैसे बिजली बनायीं जा सकती है इस पर ही रिसर्च पेपर पब्लिश हो जातें  है  सैटलाइट या मिसाइल परिक्षण  के दौरान  वैज्ञानिक  'अल्लाह हू अकबर ' के नारे लगाते हैं ।  ऐसा नहीं की वे वैज्ञानिक नहीं हैं परन्तु फिर  भी उनके वैज्ञानिक नज़रिए में धर्म की छाया जरूर होती है, ये एक वैज्ञानिक सोच में रूकावट पैदा करती है ।   अक्सर हम एशियाई  देशो की ये ही सबसे बड़ी समस्या है, हम हर खोज, तकनीक को कही ना कही धर्म से जोड़ ही देते हैं । हमारे यहाँ रिसर्च ना होने के भी यही कारण हैं, पश्चिमी देश इन चीज़ो से निकल चुके हैं । सन 1850  से 1950 बड़ी बड़ी रिसर्च का दौर रहा है, इनमे ज्यादातर ऐसे लोग थे जिन्हे बहुत ज्यादा धुन थी कुछ  करने की और वे बहुत ही ज्यादा धार्मिक नहीं थे । हाँ कुछ अद्भुत लोग भी हुए हैं जैसे आइंस्टीन, उन्होंने तो गॉड की परिकल्पना को ही इक्वेशन से साबित करने का प्रयास किया था ।
धर्म और विज्ञान दोनों ही दो अलग विषय, दोनों का अलग अलग अध्ययन जरूरी है पर दोनों का घाल-मेल नहीं होना चाहिए ।  मुझे नहीं पता कौन सी ऐसी रिसर्च हुई जिसको किसी आयत, श्लोक या फिर कुछ लाइनों के पढ़ने के बाद किया गया हो ।
जब बात हिन्दुओं की होती है, हम हमेशा कहते है हमारा भूतकाल अच्छा रहा है, हमारे यहाँ  आर्यभट, चरक आदि जैसे महान  लोग हुयें  हैं पर बाद में क्या हुआ ? कुछ नामों  को छोड़ दे हमारा सफर जीरो ही रहा है ।
और यही आज हमारे अर्थव्यवस्था  की परेशानी का कारण  है, इतने हथियारों, आधुनिक उपकरणों का हमें आयात करना पड़ता क्यूंकि हमने वैज्ञानिक सोच को मौका ही नहीं दिया, जो हुए भी वो भी हमें छोड़  के दूसरे देशो में चले गए । ये सरकारों को सोचना पड़ेगा वो कैसा समाज चाहते हैं, ऐसा समाज जो धर्म के नाम पे लड़ता हो या फिर एक धर्मनिरपेक्ष जिसमे स्वतः एक आधुनिक वैज्ञानिक सोच हो ।
जहाँ तक मेरा मानना  है धर्म और तर्क रेल की पटरियों जैसे हैं जो चलते साथ पर  मिलते कभी नहीं, पर जब मिलते है तो दुर्घटना जरूर होती है ।  इसलिए हमें एक ऐसे समाज की आवश्यकता है जो इन दोनों में विभेद कर सके, नहीं तो हम आज जैसे हैं वैसे ही रहेंगे, दिन रात महाशक्ति का  दम्भ भरेंगे पर डेंगू और चिकनगुनिया से ही हजारो मौतें हो जाया करेंगी। 

Sunday, February 21, 2016

भारत में सोशल मीडिया और लोकतंत्र


पिछले कई दिनों से JNU का मुद्दा एक बड़ा ही टॉपिक बन कर उभरा है, इसके विरोध मे तमाम ही हैश टैग चलाये गए । लोगो नो बहुत कुछ लिखा , कुछ चैनेलो से कथित रूप से गलत वीडियो भी चलाई गयी, कई दिनों से तो #shutdownJNU ट्रेंड काफी छाया
रहा ।  पर क्या सचमुच ऐसी नौबत आ गयी है की JNU को बंद कर दिया जाय, JNU ने इस देश को बहुत सारे बुद्धिजीवी दिए हैं, फिर अचानक ऐसा क्या हो गया की JNU को बंद करने की  मांग होने लगी,  ये बंद कराने वाले वही लोग है जो पहले से ही वामपंथी विचार धाराओ से खार खाए बैठे थे,  उन्हें तो ये बैठे बिठाये मुद्दा मिल गया । बस फिर क्या था फेसबुक और ट्विटर पे लोगों की प्रतिक्रियाओं की बाढ़ आ गयी । पर क्या ये स्वतः थी ? पता नही पर कई बार इन्हे संगठित होकर बढ़ावा दिया जाता है । और लोग इन्हे सच मान लेते हैं ।
भारत में सोशल मीडिया ने एक ऐसी जमात बना दी जिन्हे सारा इतिहास ,भूगोल बस यही  से मिलता है, चाहे वो एटली को लिखे गए नेहरू के लेटर  या फिर नेहरू और गांधी की बारे में फोटोशॉप जानकारियां । इन जमातों में सबसे ज्यादा तो आईटी प्रोफेशनल और मैनेजमेंट वाले लोग हैं, जिन्हे इतिहास पढ़ने में कोई दिलचस्पी नहीं रही या बहुत पहले ही छोड़  दिया हो, और किसी एक पार्टी के पेज को लाइक करके सारा ज्ञान वही से लेते हैं । इस लोकतंत्र  के सबसे बड़े दुश्मन ऐसे ही लोग हैं जो किसी पार्टी की विचारधारा या उसके तोड़ मरोड़ कर पेश किये गए तथ्य को सही मान लेते हैं, और  इससे अपने मत का निर्णय करते हैं । राजनीतक पार्टियों ने भी अद्भुत सक्रियता दिखाई है, वो समझ गयी है की ऐसे लोगो की जमात बहुत ज्यादा है जो सोशiल मीडिया से जानकारी लेते हैं, उन्होंने हर तरह के लोगो को टारगेट करना शुरू कर दिया है, जिनके पास ज्यादा टाइम नही है उनके लिए चुटकुले बनाये गए जो की पार्टी विशेष की विचारधाराओं को प्रचारित करते हैं , कई तरह के पेज बनाये गए, जिनपे पार्टी के बारे में प्रचार-प्रसार किया जाता हैं । अब तो पॉपुलर पेज भी  हथिया लिया जाता है जैसे "India against corruption" पे अब बीजेपी का प्रचार होता है, लगता है जैसे बीजेपी में करप्शन है ही नहीं।  ज्यादातर  पार्टियों की जिले के अनुसार आईटी सेल है, ऊपर बैठे लोग निर्णय लेते हैं की क्या टॉपिक होगा और उसे व्हाट्सप्प से या सोशल मीडिया से फैलाया जाता है, ऐसे ही ट्विटर ट्रेंड निर्धारित होते हैं, इंडिया लेवल पे ट्रेंड कराने  के लिए १५०० -२००० ट्वीट और वर्ल्ड लेवल के लिए २५००० के करीब । सबसे मज़ेदार तो ये है की तमाम newspaper  की साइट पे खबर के कमेंट बॉक्स को भी एक सुनियोजित तरीके से टारगेट किया जाता है , अगर खबर में विपक्षी पार्टी की तारीफ़ है या कुछ अच्छी बातें हैं तो उस न्यूज़ को सबसे ज्यादा निशाना बनाया जाता है और फेक आई डी  के सहारे नेगेटिव कमेंट किये  जाते हैं । अगर यकीं नहीं तो ये एक रिसर्च प्रोजेक्ट देखिये  [http://trueliesbuster.blogspot.in/2013/08/the-structure-and-strategy-of-troll.html]

मुझे याद है जब २०१४ के चुनाव से पहले  सत्यमेव जयते के एक एपिसोड में "Criminalization of Poliics"
 पे बात की गयी थी, और फिर उसके बाद आमिर खान के बारे में कितना दुस्प्रचार हुआ था ।
आज के इस बाज़ारीकरण के दौर में किसानों  की आत्महत्या और भुखमरी के विषय गौण हो गए हैं और उनको कोई नहीं पूछता, अकेले वर्ष २०१५  में ३२२८ किसानो ने आत्महत्या की है महाराष्ट्र में, देश के ९० प्रतिशत किसानो के परिवार के औसत आय १०००० रुपये मासिक से भी कम  है, कभी ये विषय ट्रेंड हुआ, कभी  नही।
 दुनिया में अरबपतियों की संख्या में भारतीय तीसरे पायदान पर हैं पर ह्यूमन डेवलपमेंट इंडेक्स में भारत १३० वें  स्थान पे हैं , इराक, मालदीव और श्रीलंका जैसे देश भी हमसे आगे हैं, ये विषय ट्रेंड हुआ कभी, नही ।

सोशल मीडिया पे दुष्प्रचारों,अफवाहों  से ऐसे  मुद्दो को ढक दिया जाता है, कोई उठाना भी चाहता है तो उसपे विकास विरोधी, नक्सली का  ठप्पा लगा दिया जाता है । ये सब एक साज़िश है जिनके शिकार हम सब है, ये दुस्प्रचार हमारे अपनी सोच को पनपने नहीं देता है और हम हमेशा एक पार्टी की सोच के  गुलाम बन के रह जाते हैं, भारत में सोशल मीडिया का विस्तार एक बड़ी उपलब्धि रही है पर जब तक ये गाँव के लोगो के पास उपलब्ध होगी  तब तक वो गावं नहीं रहेंगे वो किसान नहीं रहेंगे ।






Tuesday, June 16, 2015

समाज और गालियाँ


रास्ते चलते, कहीं सफर करते, एक चीज़ बहुत ही सामान्य है जो सुनने को मिलेगी वो है गाली । कोई आपस
में, तो कोई झगडे में, तो कोई सुदूर स्थित किसी रिश्तेदार को, कोई अपने बॉस को, बस बिना मांगे गालियां जरूर देता है । किसी ने कहा है कि अगर कोई गाली दे तो, जब तक आपने लिया नहीं वो आप पे नहीं है, अब पता नहीं कितने लोग इसको फॉलो करते होंगे । पर एक चीज़ तो स्पष्ट है ये सदैव महिलाओं को लक्ष्य करके बनायीं गयी हैं। अब पता नहीं इसका इतिहास क्या है और कैसे शुरू हो गयी, पता नहीं हमारे पूर्वज चाहे वो राजा महाराजा हो या कोई और गालियां देते थे की नहीं ? इतना तो तय है की ये भी हमारी उस संस्कृति का हिस्सा है जिसपे हमें हमेशा गर्व रहता है, ये हमारी उस  सोच की उपज है जहा हमें लगता है कि पुरुष ही सर्वोपरि है और महिलाओँ  का स्थान उनसे नीचे ही है ।
हमारे यहाँ की कुछ आम बोल चाल की गालियां भी देखिये जैसे "साला " या फिर भोजपुरी में जैसे "ससुरा " भी महिलाओं के रिश्तेदारियों पे बनी हैं । ऐसा नहीं किए ये भारत में ही है बल्कि ये आपको विश्व के और भी देशों में मिल जाएँगी, सबमें बस महिलाओं को ही लक्ष्य बनाया गया है । पुरुषों के लिए एक भी गाली नहीं है यहाँ तक की महिलायें भी जो गालियां प्रयोग करती वो खुद भी महिलाओं के लिए ही होती है, वे आज तक पुरुषो के लिए गालियां तक ना बना सकी ।
कल्पना करिये क्या गुस्सा बिना गालियों के नही हो सकता, क्या पुलिस बिना गाली के मुजरिम से पूछ ताछ नही कर सकती, ये हो सकता है और बहुत सारे लोग ऐसे होंगे भी जो ऐसा करते भी होंगे , ये बस उस संस्कृति का हिस्सा है जो हमारे चारो ओर है, और जिसमे हम शुरू से रहते आ रहें हैं । विश्व योग दिवस की तरह हमें एक और दिवस की जरूरत है जहाँ हम अपने मानसिक विकार मिटाने का भी संकल्प ले, नहीं तो ये विकार हमारी कई पीढ़ियां बर्बाद कर देगा । 



Monday, April 27, 2015

भारत में सॉफ्टवेयर इंजीनियर का स्ट्रगल


 नवाबों  के शहर लखनऊ में उस वक़्त इंजिनीयरिंग कॉलेजों की भरमार सी हो गयी थी, हर थोड़ी दूर पे कोई न कोई कॉलेज मिल ही जाता । कॉलेजों में भी ऐसी होड़ मानो वो सबको इंजीनियर या डॉक्टर ही बना के छोड़ेंगे । किसी के एस एम एस (SMS ) तो कोई रोड पे पम्फ्लेट बाटते मिल ही जाता । मैंने भी ऐसे ही एडमिशन ले लिया और कोर्स का नाम था एम सी ए ( MCA ). पता नहीं क्यों मुझे हर बार ये कोर्स ऐसे लगता मानो किसी ने इसे बना तो दिया मगर इसके बाद वो भूल गया कि इसका करना क्या है । पता नहीं उसको क्या सूझी और ऐसा सौतेला व्यवहार इसके साथ किया की बस पूछिये मत ।
 3 साल ग्रेजुएशन और 3 साल पोस्ट ग्रेजुएशन के बाद भी MCA  वालो को Btech के बराबर नहीं समझते , MCA वालो का हाल मेले में बिकने वाली बूढी गाय जैसा होता है जो की पसंद तो सबको है पर ज्यादा उम्र होने के कारण खरीदता  कोई नही ।
मेरे कई सारे मित्रों ने MBA में एडमिशन लिया , उनका हाल तो बस पूछिये मत, वे हर रोज हमें यही बताते की तुम जितना चाहे मेहनत करो, कुछ भी करो रहोगे हमारे नीचे ही, अब भला ये भी कम भेदभाव था क्या ? उनकी दो साल की पढाई और हमारी तीन साल की और फिर भी हम उनके नीचे काम करेंगे । पर करें भी तो क्या MCA ऐसा है ही ।
साल गुजरते गए, इतने दिनों में मैंने एक चीज़ जरूर महसूस किया कि सबका कोई न कोई माई बाप है जो उनको बाहर मतलब ( भारत से बाहर ) जॉब दिला देगा, किसी के भैया तो किसी के मामा तो कोई अपने होने वाले जीजा से पहले ही बात कर लिया, लगता था कि इधर रिजल्ट आया नहीं की उधर बाहर जाना तय है। कई लोगो ने तो फाइनल ईयर का प्रोजेक्ट बनाने से पहले अपना पासपोर्ट बनाना उचित समझा । इधर एग्जाम के बाद कंपनियों  का आने का सिलसिला शुरू हुआ, पर उनका क्राइटेरिया ऐसा कि  95 % लोग तो फिट ही नहीं बैठते , ऐसा लगता मानो  ये सब पिछले कुछ वर्षो के पापों का प्रायश्चित था, अब पछतावा होता कि उस समय थोड़ा और प्रैक्टिकल विषयों पे ध्यान दे देते तो आज ये दिन ना देखने को मिलते । हमारे कॉलेज में फिऱ भी एक दो कंपनी का आगमन हुआ मगर कइयों में तो दूर दूर तक दर्शन नहीं हुए ।
अब एक ही स्थान था जो हमें इस कलंक से मुक्ति दिला सकता था और वो था दिल्ली। हमने भी दिल्ली चलो का नारा दिया और कई सारे मित्रों के साथ दिल्ली प्रस्थान कर दिया । जैसे सिविल सर्विसेज की प्रिपरेशन के लिए मुखर्जी नगर मशहूर है वैसे ही सॉफ्टवेयर इंजीनियर के लिए न्यू अशोक नगर । न्यू अशोक नगर में हर जगह लोग जावा , डॉट नेट करते मिल जायेंगे, तभी एक कहावत यहाँ बहुत ही मशहूर है कि अगर आप यहाँ कोई पत्थर उछालो तो वो जरूर किसी ना किसी सॉफ्टवेयर इंजीनियर के उपर ही गिरेगा  । 
सरकारी नौकरियों के विपरीत सॉफ्टवेयर इंजीनियरों की भर्ती एक दम अलग होती है, ना कोई फॉर्म ना कोई चालान का झंझट बस वेबसाइट से पता करो और रिज्यूम और पानी की बोतल ले के निकल जाओ ।  फ्रेशर को तो कंपनी का गार्ड ही गेट से भगा देता, पता नहीं इस फील्ड में कोई एक्सपेरिन्स  कैसे पाता  है ये बात मेरे लिए आज भी एक पहेली बनी  हुई है । एक चीज़ और, हमेशा walkin  से बचना चाहिये  पता नहीं कब पुलिस भीड़  कंट्रोल करने के लिए डंडा चला दे । नॉएडा तो walikin  का एक गढ़ है, सॉफ्टवेयर कंपनी के रिक्रूटमेंट की एक खासियत होती है आपको सीट नहीं पता चलती बस आप अपना कर्म करते रहिये अगर अच्छा हुआ तो ठीक नहीं तो HR की प्यारी सी मुस्कान के साथ "लीव फॉर द  डे " सुनिए ।  यहाँ सरकारी नौकरी जैसा कुछ भी नहीं कि आपका रोल नंबर लिस्ट में होगा या नहीं होगा, यहाँ अगर आप नहीं भी सेलेक्ट होते तो आपको आपके ना सेलेक्ट होने की खबर ऐसे दी जाएगी की बस आप समझते समझते अपने घर पहुंच जायेंगे कि आखिर हुआ
क्या ।
खैर, जब ऐसे भी कुछ ना हुआ तो मैंने भी कंसल्टेंसी जाने का निर्णय किया,नया होने के कारण  कुछ पता नहीं था बस सुना था की लक्ष्मी नगर में बहुत सी कंसल्टेंसी है, मैंने भी १०० रुपये देकर रजिस्ट्रेशन करा लिया । रात और दिन इस इंतज़ार में कटते  मानो कब कॉल आ जाये । बस फिर अगले दिन कॉल आई और मैं गया भी पर मैं जाते ही समझ गया की ये सब पैसे बनाने के तरीके हैं । दिल्ली में आपको ऐसे भी कंपनी मिलेगी जहाँ आपको अपने लैपटॉप के साथ जाना पड़ेगा और जहाँ आपने सैलरी की बात की तो बस पूछिये मत, इतना वर्कलोड मिलेगा की या तो आप कंपनी छोड़ देंगे या फिर दुबारा सैलरी मांगने की हिम्मत ना करेंगे । कुछ तो कंपनी ऐसे भी मिलेंगी जो आपके पैसे लेकर आपको ही देंगे और फिर कुछ महीनो बाद वहां कंपनी के कोई अवशेष ना मिलें ।

विश्व के सबसे हसीन जॉब की तमन्ना दिल्ली आ के दम तोड़ देगी, जब आपको लोग बिना सैलरी के जॉब करते मिलेंगे वो भी केवल एक्सपेरिंस पाने के लिए, सोच लीजये क्या अब भी आप भारत में सॉफ्टवेयर इंजीनियर बनना चाहते हैं ?