पिछले कई दिनों से JNU का मुद्दा एक बड़ा ही टॉपिक बन कर उभरा है, इसके विरोध मे तमाम ही हैश टैग चलाये गए । लोगो नो बहुत कुछ लिखा , कुछ चैनेलो से कथित रूप से गलत वीडियो भी चलाई गयी, कई दिनों से तो #shutdownJNU ट्रेंड काफी छाया
रहा । पर क्या सचमुच ऐसी नौबत आ गयी है की JNU को बंद कर दिया जाय, JNU ने इस देश को बहुत सारे बुद्धिजीवी दिए हैं, फिर अचानक ऐसा क्या हो गया की JNU को बंद करने की मांग होने लगी, ये बंद कराने वाले वही लोग है जो पहले से ही वामपंथी विचार धाराओ से खार खाए बैठे थे, उन्हें तो ये बैठे बिठाये मुद्दा मिल गया । बस फिर क्या था फेसबुक और ट्विटर पे लोगों की प्रतिक्रियाओं की बाढ़ आ गयी । पर क्या ये स्वतः थी ? पता नही पर कई बार इन्हे संगठित होकर बढ़ावा दिया जाता है । और लोग इन्हे सच मान लेते हैं ।
भारत में सोशल मीडिया ने एक ऐसी जमात बना दी जिन्हे सारा इतिहास ,भूगोल बस यही से मिलता है, चाहे वो एटली को लिखे गए नेहरू के लेटर या फिर नेहरू और गांधी की बारे में फोटोशॉप जानकारियां । इन जमातों में सबसे ज्यादा तो आईटी प्रोफेशनल और मैनेजमेंट वाले लोग हैं, जिन्हे इतिहास पढ़ने में कोई दिलचस्पी नहीं रही या बहुत पहले ही छोड़ दिया हो, और किसी एक पार्टी के पेज को लाइक करके सारा ज्ञान वही से लेते हैं । इस लोकतंत्र के सबसे बड़े दुश्मन ऐसे ही लोग हैं जो किसी पार्टी की विचारधारा या उसके तोड़ मरोड़ कर पेश किये गए तथ्य को सही मान लेते हैं, और इससे अपने मत का निर्णय करते हैं । राजनीतक पार्टियों ने भी अद्भुत सक्रियता दिखाई है, वो समझ गयी है की ऐसे लोगो की जमात बहुत ज्यादा है जो सोशiल मीडिया से जानकारी लेते हैं, उन्होंने हर तरह के लोगो को टारगेट करना शुरू कर दिया है, जिनके पास ज्यादा टाइम नही है उनके लिए चुटकुले बनाये गए जो की पार्टी विशेष की विचारधाराओं को प्रचारित करते हैं , कई तरह के पेज बनाये गए, जिनपे पार्टी के बारे में प्रचार-प्रसार किया जाता हैं । अब तो पॉपुलर पेज भी हथिया लिया जाता है जैसे "India against corruption" पे अब बीजेपी का प्रचार होता है, लगता है जैसे बीजेपी में करप्शन है ही नहीं। ज्यादातर पार्टियों की जिले के अनुसार आईटी सेल है, ऊपर बैठे लोग निर्णय लेते हैं की क्या टॉपिक होगा और उसे व्हाट्सप्प से या सोशल मीडिया से फैलाया जाता है, ऐसे ही ट्विटर ट्रेंड निर्धारित होते हैं, इंडिया लेवल पे ट्रेंड कराने के लिए १५०० -२००० ट्वीट और वर्ल्ड लेवल के लिए २५००० के करीब । सबसे मज़ेदार तो ये है की तमाम newspaper की साइट पे खबर के कमेंट बॉक्स को भी एक सुनियोजित तरीके से टारगेट किया जाता है , अगर खबर में विपक्षी पार्टी की तारीफ़ है या कुछ अच्छी बातें हैं तो उस न्यूज़ को सबसे ज्यादा निशाना बनाया जाता है और फेक आई डी के सहारे नेगेटिव कमेंट किये जाते हैं । अगर यकीं नहीं तो ये एक रिसर्च प्रोजेक्ट देखिये [http://trueliesbuster.blogspot.in/2013/08/the-structure-and-strategy-of-troll.html]
मुझे याद है जब २०१४ के चुनाव से पहले सत्यमेव जयते के एक एपिसोड में "Criminalization of Poliics"
पे बात की गयी थी, और फिर उसके बाद आमिर खान के बारे में कितना दुस्प्रचार हुआ था ।
आज के इस बाज़ारीकरण के दौर में किसानों की आत्महत्या और भुखमरी के विषय गौण हो गए हैं और उनको कोई नहीं पूछता, अकेले वर्ष २०१५ में ३२२८ किसानो ने आत्महत्या की है महाराष्ट्र में, देश के ९० प्रतिशत किसानो के परिवार के औसत आय १०००० रुपये मासिक से भी कम है, कभी ये विषय ट्रेंड हुआ, कभी नही।
दुनिया में अरबपतियों की संख्या में भारतीय तीसरे पायदान पर हैं पर ह्यूमन डेवलपमेंट इंडेक्स में भारत १३० वें स्थान पे हैं , इराक, मालदीव और श्रीलंका जैसे देश भी हमसे आगे हैं, ये विषय ट्रेंड हुआ कभी, नही ।
सोशल मीडिया पे दुष्प्रचारों,अफवाहों से ऐसे मुद्दो को ढक दिया जाता है, कोई उठाना भी चाहता है तो उसपे विकास विरोधी, नक्सली का ठप्पा लगा दिया जाता है । ये सब एक साज़िश है जिनके शिकार हम सब है, ये दुस्प्रचार हमारे अपनी सोच को पनपने नहीं देता है और हम हमेशा एक पार्टी की सोच के गुलाम बन के रह जाते हैं, भारत में सोशल मीडिया का विस्तार एक बड़ी उपलब्धि रही है पर जब तक ये गाँव के लोगो के पास उपलब्ध होगी तब तक वो गावं नहीं रहेंगे वो किसान नहीं रहेंगे ।
पे बात की गयी थी, और फिर उसके बाद आमिर खान के बारे में कितना दुस्प्रचार हुआ था ।
आज के इस बाज़ारीकरण के दौर में किसानों की आत्महत्या और भुखमरी के विषय गौण हो गए हैं और उनको कोई नहीं पूछता, अकेले वर्ष २०१५ में ३२२८ किसानो ने आत्महत्या की है महाराष्ट्र में, देश के ९० प्रतिशत किसानो के परिवार के औसत आय १०००० रुपये मासिक से भी कम है, कभी ये विषय ट्रेंड हुआ, कभी नही।
दुनिया में अरबपतियों की संख्या में भारतीय तीसरे पायदान पर हैं पर ह्यूमन डेवलपमेंट इंडेक्स में भारत १३० वें स्थान पे हैं , इराक, मालदीव और श्रीलंका जैसे देश भी हमसे आगे हैं, ये विषय ट्रेंड हुआ कभी, नही ।
सोशल मीडिया पे दुष्प्रचारों,अफवाहों से ऐसे मुद्दो को ढक दिया जाता है, कोई उठाना भी चाहता है तो उसपे विकास विरोधी, नक्सली का ठप्पा लगा दिया जाता है । ये सब एक साज़िश है जिनके शिकार हम सब है, ये दुस्प्रचार हमारे अपनी सोच को पनपने नहीं देता है और हम हमेशा एक पार्टी की सोच के गुलाम बन के रह जाते हैं, भारत में सोशल मीडिया का विस्तार एक बड़ी उपलब्धि रही है पर जब तक ये गाँव के लोगो के पास उपलब्ध होगी तब तक वो गावं नहीं रहेंगे वो किसान नहीं रहेंगे ।

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