अभी कल ही मैदान में घाँस काटी थी, अच्छा खासा पानी दे के आये थे, और आज लगता है बारिश हो के पुरे मैदान को गीला कर देगी। पूरी रात और अगले दिन तक ये ख्याल दिमाग में बार बार आते । पर ये बात आज की नहीं १० -१२ साल पहले की है जब क्रिकेट ही हमारे लिए सब कुछ था। क्रिकेट का मैदान ही घर हुआ करता था। आज भी जब ऐसे ही मैदानों के पास से गुजरता हूँ तो जरूर एक बार ऐसा लगता कि शायद यहाँ भी खेलने वाले ऐसे सोचते होंगे, उन्हें भी अपने मैदानों की ऐसी ही फिक्र होती होगी ।
हो भी क्यों न, इन्ही मैदानों ने हमें साथ रहना सिखाया, हमें लड़ना सिखाया, अलग सम्प्रदाय, अलग जाति से होते हुए भी हम सब एक थे । एक ही थाली में खाना खा ले ते और एक ही गिलास में पानी पी लेते। स्कूलों में तो बस हमें केवल बता दिया जाता, कि हम सब एक हैं, एकता में शक्ति है पर ये सब सीखते तो हम इन्ही मैदानों पे थे ।
उस समय सुबह शाम बस क्रिकेट ही याद रहता था । अपने मैदान पे खेलने के साथ कभी कभी दूसरी जगह भी खेलने जाना होता था । कई बार हमें अपनी टीम ले के दूसरे शहर जाना पड़ता, कभी किसी मित्र के बुलावे पे जाना पड़ता । पर सचमुच वो यात्रा अद्भुत होती, भरी आबादी वाले शहरों से निकल जब घने पेड़ों वाले सड़कों से गुजरते और वो भी अपने मित्रों के साथ, तो उस यात्रा का आनंद ही अलग था। कभी बीच में बाइक रोक के चाय-घाटी भी हो जाती । कभी कभी बाइक न होने पे ब्रह्मस्थान से जीप या बस में चढ़ जाते, और कंडक्टर से कहते "भइया मैच खेलने जा रहे हैं ", सवारी न होने पे तो उसे कोई दिक्कत नहीं पर भीड़ होने पे वो भी झल्ला जाता । कभी कभी कभार बस मैदान के पास ही उतार देती, और फिर तो सारे लोगों का ध्यान इधर ही हो जाता कुछ मित्र जैसे डिम्पू और अनुज को लोग पहचान जाते और मिलने आते ।
मैं अपने अनुभव के आधार पे कह सकता हूँ की अगर सच में क्रिकेट की स्परिट देखनी है तो गावों में देखिये । वो एक अतिथि की तरह लोगो का सम्मान करते हैं। जीतने पे तो शाबाशी मिलती है पर हारने पे भी पीठ थपथपाते हैं । मुझे याद है जब एक फाइनल मैच हार गए , और जब समापन समारोह में एक नेता आये थे और उन्होंने कहा था कि "हारने वाले के गले में तो पहले से ही हार होता है " गज़ब का शब्द चुनाव था।
कई बार क्रिकेट से ही शहरो की भगौलिक जानकारी और राजनीती जानकारी भी हुई, हमारे यहाँ अक्सर क्रिकेट टूर्नामेंट के उद्घाटन और समापन पे किसी न किसी गणमान्य नेता को बुलाया जाता, कई बार वो राजनीति सीख रहा होता है कई बार वो परिपक्व होता है, और ऐसे मौके उसको लोगो के बीच अपनी बात रखने का मौका देते। उसे वो साहस देते की वो लोगों के बीच अपनी बात रख सके ।
जिस जगह से मैं हूँ वहां आज भी वहां धर्म और जाति एक बड़ी बहस है, फिर भी क्रिकेट सबको बांधे रखता है। फिर चाहे वो हिन्दू हो या मुस्लिम । क्रिकेट टूर्नामेंट के नाम पे लोग खींचे चले आतें हैं चाहे दिन के मैच हो या रात्रि के। हर मुह्हले की एक टीम होती और उनके बीच कभी टाइगर बिस्कुट तो कभी कभी पार्ले जी के लिए मैच हो जाते ।
२-५ रुपये जुटा के टेनिस की बॉल आती, कुछ देते कुछ नहीं पर कोई बात नहीं थी । हाँ मैच में एंट्री फीस को लेके जरूर दिक्कत होती , पर फिर भी सब मैनेज हो जाता ।
पीढ़ियां बदलती गयी नए लोग आते गए, पहले जूनियर थे फिर सीनियर हो गए, कल टीम में होने के लिए तरसते थे फिर खुद ही टीम का चुनाव करने लगे । इन सब लोगों के साथ खेलने का एक ही अलग अनुभव था । कई मित्र किराएदार थे आज उनका कोई पता नहीं, कहाँ चले गए। आज जब मैदान नहीं और लोग इधर उधर चले गए फिर भी लगता है जैसे ये सब कल ही हुआ था, लगता है आज अभी भी हमारे मैदान वैसे ही होंगे । पर जब कभी घर जाता हूँ देखता हूँ गलियों और रास्तो के आलावा कुछ नहीं बचा, तो दुःख होता है । जिस मैदानों में लोग धुप से बचने के लिए आड़ ढूढ़ते थे आज वहां पे बसे लोग धुप के लिए तरसते हैं ।
हमें भी लगभग हर साल नया मैदान ढूढ़ना पड़ता, उसे बनाना पड़ता। दुःख तब होता जब लोगो से सुनने को मिलता की ये जमीन किसी ने खरीद ली, हम कर भी क्या कर सकते, फिर से नए मैदान का चुनाव करने में लग जाते । जब हमारे आस पास कुछ नहीं बचा तो रेलवे फील्ड और सोनी धापा मैदान जाने लगे । आज जब मैदानों पे घर बन गए, कई परिवार बस गए पर आज भी वो मैदान याद है, आज भी शाम की हलकी धुप और एक किनारे मेढ़ पे बैठे हम सब अपनी बारी का इंतज़ार करते याद है। वो शाम याद जिसमे रौशनी खत्म हो जाती पर फिर जीत हार के लिए मैच होते याद है । वो जोश जिसमे क्रिकेट के कई स्टंप टूट गए , मार खाये पर फिर भी क्रिकेट नहीं छोड़ा याद है । इस क्रिकेट ने कई सारे दोस्त दिए, कई सारे लोगों से परिचित कराया , कई जगहें दिखाई, उन्ही दोस्तों के साथ फिर शहर छोड़ा और एक नया रास्ता तलाशने चल दिए ।
आज कुछ ने नौकरी ज्वाइन कर ली कुछ तयारी में लगे हैं, सबने कुछ न कुछ पा लिया है पर उन्हें भी जरूर वो दिन वो शाम वो मैदान याद होंगे।
हो भी क्यों न, इन्ही मैदानों ने हमें साथ रहना सिखाया, हमें लड़ना सिखाया, अलग सम्प्रदाय, अलग जाति से होते हुए भी हम सब एक थे । एक ही थाली में खाना खा ले ते और एक ही गिलास में पानी पी लेते। स्कूलों में तो बस हमें केवल बता दिया जाता, कि हम सब एक हैं, एकता में शक्ति है पर ये सब सीखते तो हम इन्ही मैदानों पे थे ।
उस समय सुबह शाम बस क्रिकेट ही याद रहता था । अपने मैदान पे खेलने के साथ कभी कभी दूसरी जगह भी खेलने जाना होता था । कई बार हमें अपनी टीम ले के दूसरे शहर जाना पड़ता, कभी किसी मित्र के बुलावे पे जाना पड़ता । पर सचमुच वो यात्रा अद्भुत होती, भरी आबादी वाले शहरों से निकल जब घने पेड़ों वाले सड़कों से गुजरते और वो भी अपने मित्रों के साथ, तो उस यात्रा का आनंद ही अलग था। कभी बीच में बाइक रोक के चाय-घाटी भी हो जाती । कभी कभी बाइक न होने पे ब्रह्मस्थान से जीप या बस में चढ़ जाते, और कंडक्टर से कहते "भइया मैच खेलने जा रहे हैं ", सवारी न होने पे तो उसे कोई दिक्कत नहीं पर भीड़ होने पे वो भी झल्ला जाता । कभी कभी कभार बस मैदान के पास ही उतार देती, और फिर तो सारे लोगों का ध्यान इधर ही हो जाता कुछ मित्र जैसे डिम्पू और अनुज को लोग पहचान जाते और मिलने आते ।
मैं अपने अनुभव के आधार पे कह सकता हूँ की अगर सच में क्रिकेट की स्परिट देखनी है तो गावों में देखिये । वो एक अतिथि की तरह लोगो का सम्मान करते हैं। जीतने पे तो शाबाशी मिलती है पर हारने पे भी पीठ थपथपाते हैं । मुझे याद है जब एक फाइनल मैच हार गए , और जब समापन समारोह में एक नेता आये थे और उन्होंने कहा था कि "हारने वाले के गले में तो पहले से ही हार होता है " गज़ब का शब्द चुनाव था।
कई बार क्रिकेट से ही शहरो की भगौलिक जानकारी और राजनीती जानकारी भी हुई, हमारे यहाँ अक्सर क्रिकेट टूर्नामेंट के उद्घाटन और समापन पे किसी न किसी गणमान्य नेता को बुलाया जाता, कई बार वो राजनीति सीख रहा होता है कई बार वो परिपक्व होता है, और ऐसे मौके उसको लोगो के बीच अपनी बात रखने का मौका देते। उसे वो साहस देते की वो लोगों के बीच अपनी बात रख सके ।
जिस जगह से मैं हूँ वहां आज भी वहां धर्म और जाति एक बड़ी बहस है, फिर भी क्रिकेट सबको बांधे रखता है। फिर चाहे वो हिन्दू हो या मुस्लिम । क्रिकेट टूर्नामेंट के नाम पे लोग खींचे चले आतें हैं चाहे दिन के मैच हो या रात्रि के। हर मुह्हले की एक टीम होती और उनके बीच कभी टाइगर बिस्कुट तो कभी कभी पार्ले जी के लिए मैच हो जाते ।
२-५ रुपये जुटा के टेनिस की बॉल आती, कुछ देते कुछ नहीं पर कोई बात नहीं थी । हाँ मैच में एंट्री फीस को लेके जरूर दिक्कत होती , पर फिर भी सब मैनेज हो जाता ।
पीढ़ियां बदलती गयी नए लोग आते गए, पहले जूनियर थे फिर सीनियर हो गए, कल टीम में होने के लिए तरसते थे फिर खुद ही टीम का चुनाव करने लगे । इन सब लोगों के साथ खेलने का एक ही अलग अनुभव था । कई मित्र किराएदार थे आज उनका कोई पता नहीं, कहाँ चले गए। आज जब मैदान नहीं और लोग इधर उधर चले गए फिर भी लगता है जैसे ये सब कल ही हुआ था, लगता है आज अभी भी हमारे मैदान वैसे ही होंगे । पर जब कभी घर जाता हूँ देखता हूँ गलियों और रास्तो के आलावा कुछ नहीं बचा, तो दुःख होता है । जिस मैदानों में लोग धुप से बचने के लिए आड़ ढूढ़ते थे आज वहां पे बसे लोग धुप के लिए तरसते हैं ।
हमें भी लगभग हर साल नया मैदान ढूढ़ना पड़ता, उसे बनाना पड़ता। दुःख तब होता जब लोगो से सुनने को मिलता की ये जमीन किसी ने खरीद ली, हम कर भी क्या कर सकते, फिर से नए मैदान का चुनाव करने में लग जाते । जब हमारे आस पास कुछ नहीं बचा तो रेलवे फील्ड और सोनी धापा मैदान जाने लगे । आज जब मैदानों पे घर बन गए, कई परिवार बस गए पर आज भी वो मैदान याद है, आज भी शाम की हलकी धुप और एक किनारे मेढ़ पे बैठे हम सब अपनी बारी का इंतज़ार करते याद है। वो शाम याद जिसमे रौशनी खत्म हो जाती पर फिर जीत हार के लिए मैच होते याद है । वो जोश जिसमे क्रिकेट के कई स्टंप टूट गए , मार खाये पर फिर भी क्रिकेट नहीं छोड़ा याद है । इस क्रिकेट ने कई सारे दोस्त दिए, कई सारे लोगों से परिचित कराया , कई जगहें दिखाई, उन्ही दोस्तों के साथ फिर शहर छोड़ा और एक नया रास्ता तलाशने चल दिए ।
आज कुछ ने नौकरी ज्वाइन कर ली कुछ तयारी में लगे हैं, सबने कुछ न कुछ पा लिया है पर उन्हें भी जरूर वो दिन वो शाम वो मैदान याद होंगे।
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