Sunday, June 26, 2016

ये कैसी बारिश !

सूखे हुए दरख्तों से आवाज़ आई, उफ्फ क्या बला आई
जो गिरी कुछ बुँदे जमीं पे, क्या खूब घटा छाई
अब सारे परिंदे घर की राह देखेंगे
छोटे बड़ों का साथ देखेंगे
फ़ैल जायेगी हरियाली हर तरफ
उफनते नदियों का सैलाब देखेंगे ।

मैं भी चंद हिस्से जमा कर लेता हूँ
इन्ही दरख्तों को घर बना लेता हूँ
इन बारिशों की तेज धार में
हरे पत्तों की आड़ ले लेता हूँ ।

इन शाखों पे मैं अकेला नहीं
हैं और भी जो खूब जमे बैठे हैं
चहकते शोरों के बीच
जो खूब सजे बैठे हैं ।

कुछ उड़ते, कुछ बैठते
कुछ पंखो को फड़फड़ाते
हर बिजली की गरज पे
कुछ बच्चे यूँ ही डर जाते

पत्तों से गिरती छन के बुँदे
पंखों को जब भिगो देती
माँ पंखो को फैला के
एक पल में झटक देती।

ये देख बच्चे भी इन्हे यूँ ही दोहराते
पंखो को फड़फड़ाते
माँ - मां  चिल्लाते
और फिर सीख जाते ।

क्या पता कब ये थमेगी बारिश
कब फिर से आसमान साफ़ होगा
कब चढ़ेगा फिर से सूरज
कब चमकते तारों का प्रकाश होगा ।

उफ़ ये लहरती बारिश ,
उफ़ ये ठहरती बारिश
उफ़ ये चमकती बारिश
उफ़ ये गरजती बारिश ।

इस बिजली की कड़क में
कितने यूँ  ही मर जाएंगे
कितने हो जायेंगे घोंसले खाली
कितने घर उजड़ जायेंगे ।

हम पछियों की यही दास्ताँ है
कभी यहाँ कभी वहाँ आसिया हैं
घटते पेड़ और सूखती नदियां
बदलते मौसम ही कब्र्गाह हैं

लो थम गयी बारिश
उड़ने  का वक़्त आ गया
चलता हूँ नए जगह
घर छोड़ने का वक़्त आ गया ।


 

















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