कल ही आलमारी खंगालते कुछ किताबो से पाला पड़ा
मानो सालो पहले की तस्वीरों का मुआयना चाहती
धुल में लिपटी गन्दी मटमैली, बिखरी
फिर भी बहुत सी यादें समेटे ।
हर पन्ने पे कुछ यादें यू उभर जाती
कुछ भीगी, कुछ खुशबू, कुछ मिटटी
आज भी वो सारे पल वो समेटे बैठी
जब मैं कुछ नहीं था, जब मैं केवल छात्र था ।
वो खींची गयी रेखाएं , जो कुछ याद दिलाती
वो स्कूल का शोर , वो टीचर की बातें
वो परीक्षाओं का दौर , वो जल्द बीतने वाली रातें
वो ३ घंटे की शांति और फिर जबरदस्त शोर ।
कुछ भीग के सूखे पन्ने, कुछ फटे पन्ने
याद दिलाते उस बारिश का,
जो जब उस समय ही बरसी थी
फिर आज तक नहीं हुई
फटे पन्ने तो बस कुछ शरारत की निशानियां थे ।
शहर दर शहर साथ थी, थक के भी इन्ही पे सोया
कभी खोयी कभी कभी मिल गयी
खूब छकाया खूब दौड़ाया
कभी इस दुकान कभी उस दुकान
कभी इस दोस्त के पास कभी उसके पास
आज तो उनका पता नहीं
पर फिर ये मुझे नहीं भूली
उनकी निशानियां आज भी मौजूद हैं ।
कुछ शब्द तो लिखे हैं
पर क्या करूँ आज तो याद भी नहीं किसने लिखे
अच्छा इम्तेहान है ये अतीत पहचानने का
याद दिलाने का की कितना मैं बदल गया
और कितना सब भूल गया।
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